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विरह

ल गता है कभी रो-रो के उठ जाता हूँ।  सिरहाने और आँखों को सूखा ही पाता हूँ।  मखौल पे हँसी कम आती है,  नाराज़गी अंदर ही रह जाती है।  रोना भूल गया हूँ शायद,  या रोने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।  रोना आता तो बहुत है,  अपरंपार, हर वक्त, हर बार,  बस सिसक-सिसक के रो नहीं पाता।  अजीब लगता है कितना रोने की इच्छा रखना।  दर्द लेके जो गरीब चले जा रहे हैं,  ज़िंदगी से बिन हथियार, एक अदृश्य लड़ाई लड़े जा रहे हैं।  उनसे पूछो, कभी रो पाए तो दर्द कम होता है।  ये पता है उनको,  लेकिन अपने दर्द से ज़रूरी खुशी है उसकी,  ये लगता है उनको।  हाल जो कोई पूछे तो बढ़िया ही बताता हूँ।  जवाब में लिहाज़ की बात नहीं।  हाल कि मेरे मुझको खुद कोई खबर नहीं।  मेरे हाल की किसी को कोई फिकर नहीं,  पता है, ...... पता है ,  पर इसका मुझको कोई दर्द नहीं।  या ऐसा समझ लो कि किसी भी नए दर्द की अब कोई जगह नहीं।  ऐसा लगता था मुझको, और काश ऐसा ही होता।  ऐसा लगता था मुझको, जब तक तेरी विरह का जो दर्द असीमित-सा था,  ते...
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1) कुर्बत में बेवाफ़ाई, फुर्कत में वफ़ा ढ़ूढंता हूं दुनिया मे कैद, खुद से रिहाई ढ़ूढंता हूं ©️ नकुल चतुर्वेदी, जुलाई 29, 2022 2) मुज़्दा की खोज में हूं कई उम्रों से, उब मुकम्मिल ना होने के डर से डर लगना बंद हो गया (- नकुल) ईऋते खत्र है दरिया में फना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना (- ग़ालिब) ©️ नकुल चतुर्वेदी, जुलाई 29, 2022

ज़माने

उस समय की भी कोई मजबूरी ज़रूर होगी इस रस्म की भी कोई कहानी ज़रूर होगी वफ़ा का वादा किया था, उसकी ज़रूरत होगी उसको निभानी की तुम्हारी नीयत भी ज़रूर होगी इंसान जो चाहे वो उसको मिल जाये ऐसे में चाहत थोड़ी कम तो ज़रूर होगी होनी मेरे मुताबिक़ न हो ये नौबत ज़रूर होगी ऐसे में मेरे दिल में थोड़ी हलचल ज़रूर होगी बुरा ज़माने में कोई नहीं होता लेकिन फिर भी कभी, हादसों की कमी नहीं होगी ©️ नकुल चतुर्वेदी , 27 June 2021

तफरी

  दिन तो तफरी में बीत जाया करते थे रातों में हम करवटों को मनाया करते थे यादों के हजूम में तेरे साथ की एक याद जब आया करते थे ग़म के आलम में भी हम मुस्कुराया करते थे  बस तेरे हाथ पकड़ने को नदिया के पार किश्ती से पहले पहुंचा करते थे तुझे सहारा देने के बहाने अरमानो को सहारा लगाया करते थे  ©️ नकुल चतुर्वेदी , 27 June 2021

रोमांच

आसमां के चांद को कहां पता ज़मीन के ईनसान की दिक्कतें जिसे वो चाहता है जहां मे सबसे ज़्यादा, उसे खबर ही नही चांद भी तो अपनी ही उलझनों में फसा है, हर समय कोई देखे उसे तो लगता है की देखता ना होगे कुछ, धब्बों के सिवाए  ©️ नकुल चतुर्वेदी , 27 June 2021

बावला सा सपना

  दूर का तारा भी बोझल लगता है तू हर 'लेकिन' में उज्जवल रहता है यूं तो पास नहीं तू मेरे, फिर भी तेरे दूर होने का डर लगता है ©️ नकुल चतुर्वेदी , 27 June 2021

नाउम्मीद

विष का प्याला भी हास्के पी लेता वस्ल-इ-यार की उम्मीद न होती जो पैरहन उतरा हुआ भी पहन लेता नज़रों में बेजाई न होती जो      हजूम के बीच बेबाकी से रह लेते ग़म-ख़ोर होने की हाजत न होती जो                     शायद थोड़ा और जी लेता मेरी उम्मीद, नाउम्मीद न होती जो ©️ नकुल चतुर्वेदी , 27 June 2021 Keywords: 1) वस्ल-इ-यार -  uniting with lover 2)  बेजाई -  destitution\ 3)  हजूम -  mass 4) बेबाकी - boldness  5) ग़म-ख़ोर -  patient sufferer 6)  हाजत -  necessity