ल गता है कभी रो-रो के उठ जाता हूँ। सिरहाने और आँखों को सूखा ही पाता हूँ। मखौल पे हँसी कम आती है, नाराज़गी अंदर ही रह जाती है। रोना भूल गया हूँ शायद, या रोने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। रोना आता तो बहुत है, अपरंपार, हर वक्त, हर बार, बस सिसक-सिसक के रो नहीं पाता। अजीब लगता है कितना रोने की इच्छा रखना। दर्द लेके जो गरीब चले जा रहे हैं, ज़िंदगी से बिन हथियार, एक अदृश्य लड़ाई लड़े जा रहे हैं। उनसे पूछो, कभी रो पाए तो दर्द कम होता है। ये पता है उनको, लेकिन अपने दर्द से ज़रूरी खुशी है उसकी, ये लगता है उनको। हाल जो कोई पूछे तो बढ़िया ही बताता हूँ। जवाब में लिहाज़ की बात नहीं। हाल कि मेरे मुझको खुद कोई खबर नहीं। मेरे हाल की किसी को कोई फिकर नहीं, पता है, ...... पता है , पर इसका मुझको कोई दर्द नहीं। या ऐसा समझ लो कि किसी भी नए दर्द की अब कोई जगह नहीं। ऐसा लगता था मुझको, और काश ऐसा ही होता। ऐसा लगता था मुझको, जब तक तेरी विरह का जो दर्द असीमित-सा था, ते...
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