लगता है कभी रो-रो के उठ जाता हूँ।
सिरहाने और आँखों को सूखा ही पाता हूँ।
मखौल पे हँसी कम आती है,
नाराज़गी अंदर ही रह जाती है।
रोना भूल गया हूँ शायद,
या रोने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
रोना आता तो बहुत है,
अपरंपार, हर वक्त, हर बार,
बस सिसक-सिसक के रो नहीं पाता।
अजीब लगता है कितना रोने की इच्छा रखना।
दर्द लेके जो गरीब चले जा रहे हैं,
ज़िंदगी से बिन हथियार, एक अदृश्य लड़ाई लड़े जा रहे हैं।
उनसे पूछो, कभी रो पाए तो दर्द कम होता है।
ये पता है उनको,
लेकिन अपने दर्द से ज़रूरी खुशी है उसकी,
ये लगता है उनको।
हाल जो कोई पूछे तो बढ़िया ही बताता हूँ।
जवाब में लिहाज़ की बात नहीं।
हाल कि मेरे मुझको खुद कोई खबर नहीं।
मेरे हाल की किसी को कोई फिकर नहीं,
पता है, ......पता है,
पर इसका मुझको कोई दर्द नहीं।
या ऐसा समझ लो कि किसी भी नए दर्द की अब कोई जगह नहीं।
ऐसा लगता था मुझको, और काश ऐसा ही होता।
ऐसा लगता था मुझको, जब तक तेरी विरह का जो दर्द असीमित-सा था,
तेरी विरह का दर्द जो असीमित था, वो हर रोज थोड़ा-थोड़ा बढ़ा नहीं।
रात को रो-रो के मैं उठा, पर आँसू कभी दिखा नहीं।
घड़ी दिखी, घंटे की सुई अच्छी लगी नहीं,
खिड़की से आती हवा ठंडी जची नहीं,
शीतल चांदनी की भी परवाह नहीं,
गिरता झरना,
बहता पानी,
झूमती क्यारी कुछ भी प्यारी लगी नहीं।
खाली घर में तीन बार खटका के घुसता हूँ,
चाय हमेशा दो गिलास बनाता हूँ,
दिन के चार किस्से तकियों से बतियाता हूँ,
दिन में सौ-सौ बार तू याद आता है।
बात करते-करते दो मिनट में चुप सा हो जाता हूँ।
टनों का दर्द जो सीने में है, जुबां पे आने से बचाता हूँ।
तू मेरी आँखें,
जो जरा भी नम नहीं, वो पढ़ लेती है,
मैं भी ये समझ जाता हूँ।
कोई भी ऐवेंइ सा किस्सा बताते हुए,
अचानक से बीच में तू हौसला बढ़ाने लगती है।
सब ठीक होगा, मैं जानती हूँ, तू कहती है
और मैं मान जाता हूँ।
फिर एक लंबी सी सांस भरके चुप सा रह जाता हूँ।
जब हम मिलेंगे तो देखना, जम के बारिश होगी।
मेरा रोना शिव ही तो रोक रहे हैं,
जब सब ठीक होगा तो वो बारिश ही उसकी पहचान होगी,
जो आँसू मैं बहा न सका, जो सिसकियाँ मैं भर न सका,
उनका हिसाब सृष्टि देगी, बरसात में धुल जाएगा सब,
हम मिलेंगे जैसे कभी मिले नहीं, फिर एक नई शुरुआत होगी,
क्योंकि सब ठीक होगा।
ये तू जानती है और मैं मानता हूँ।
ये तू जानती है और मैं मानता।
© नकुल चतुर्वेदी, 15th August 2026
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