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ग़ज़ल की शकल

  हर ग़ज़ल में अपनी ज़िन्दगी का अक्स ढूंढ़ता हूँ जिसकी कमी हर महफ़िल में थी, वो शख्स ढूंढ़ता हूँ मुझे सच का शौक नहीं,  सुकून-परस्त झूठ ढूंढ़ता हूँ मुझे मौत का डर नहीं, ज़िन्दगी का कोई बहाना ढूंढ़ता हूँ धड़कने रुक गयी होती कबकी गर तेरे साथ की आस न होती तेरे दुखों के ठिकानों पर तुझे ख़ुशी देने के मौके ढूंढ़ता हूँ ©️ नकुल चतुर्वेदी , 27 June 2021

प्यार में बदलदे

तू चाय पे डूबे रस्क सा समा जा मुझमें की मेरी खुरदुराहट को मुलायम सा करदे तू समुद्री रेत सा निकल्जे मेरे हाथों से की मेरे वक़्त को ठहरा सा करदे तू सिलवटें बन चादरों की मेरी की मेरी बेखयाली को बयां सा करदे तू मेरी प्रार्थना के शंखनाद सा गूंजा की हर बात को खासम ख़ास करदे तू दोस्त की शिकायत सा पैना हो जा की मन में चुभन सी पैदा करदे तू साफ़ कपड़ो के अम्बार सा लगजा की अंदेखा देखा करदे तू पहली बारिश की वो महक बनजा  की दिल से दुखों को जुदा करदे तुझे जो बनना है वो बनजा की मुझे तुझसा और खुदको मुझसा करदे ©️ नकुल चतुर्वेदी, 22 June 2021

कुछ और ही

मुझे ज़िन्दगी से कुछ चाहिए था, ज़िन्दगी को मुझसे कुछ और  मैंने ताक पे सब रख हर बार दिल की सुनी, दिल ने हर बार कहा कुछ और बड़ी तेज़ी से मैंने सब्र की हर रात चुनी, सेहेर को बेताबी थी कुछ और मेरे तो अल्फ़ाज़ों तक ने साथ न दिया, कमबख्तों ने माइने बने कुछ और किरदार को अपने ढ़ाला मुत'अद्दिद (several) रंगों में, गदार को ज़िन्दगी से चाहिए था कुछ और सुन सुन के लोगों की मै सुन ना सका, जब तुमने मुझसे कहा कुछ और तुमने क्यों न सुना जो मैं कह न सका, क़ुव्वत-ए-फ़िक्र न गिला तुमसे है कुछ और मोहोब्बत कम कर न सका, ग़ैर-जानिबदार  (impartial) बन ना सका पन्नो पे पन्ने भरता रहा, रम्ज़-ओ-ईमा   (riddle and hint)   तक कर ना सका तू होता तो ज़िन्दगी के माइने होते कुछ और,  हैं अभी भी पर हैं कुछ और तू होता तो ज़िंदगानी होती कुछ और ©️ नकुल चतुर्वेदी, June 18, 2021 

हसरतें

हसरतें पूरी होती नहीं, की जाती हैं  दिल की हिदायत उन्हें अनोखी है लेकिन I पनपने की तय्यारी करे बिना ही पनपती हैं  हर बार आग को हवा देने कि हिमाकत सराहनीय है लेकिन  I ज़िनदगी को डर् है की हसरतों मे ना गुज़र जाएं  लम्हों का रंज है की आहों मे ही बसर जाएं  I मेरी हसरतों ने मुझे चलाया भी और जलाया भी  मैने अगर सोना चाहा तो नींद से जगाया भी  I हसातों के चहरे बदलते रहे, और नाम भी  नही बदली तो वो तपिष और उसका अनजाम भी  I मैने पूरा साथ दिया जैसे मेरे बस मे न हो कुछ और  सिलसिले चले, मैं वही रहा, बदलते रहे दौर पे दौर  I जब दुनिया मे चित को लगाया रोश ही लौट के आया  एक दिन चित मे ढूँढ़ली मैने दुनिया, तब किसीके लौटने का इंतेज़ार ही नही रहा  हसरतों से जानकारी वही थी पर जैसे कोइ वासता ही नही रहा  I थमना चाहा और थामना भी  रुकना चाहा और रोकना भी  हसना चाहा और हसाना भी  I I अधूरा कुछ ना रहा बिन पूरा हुए  मैं मैं रहा तुमहारा होते हुए  I I ©️ नकुल चतुर्वेदी , मार्च 6, 2021

एक तरफ़ा

ठीक ही था जो एक तरफ़ा था रिलेशनशिप स्टेटस होता तोह खाम-ऐ-खां का जश्न हो जाता ये खूब रहा जो एक तरफ़ा था इंस्टा स्टोरी होता 24 घंटो में फन्ना हो जाता हयात का हिस्सा नहीं किस्सा ही सही, एक तरफ़ा था अनजाने अपडेट की तरह दीवारों पे खो जाता मेरी तरफ से था, एक तरफ़ा था मेमोरी अपडेट के तौर पे साल दर साल आया पर कभी शेयर न हुआ ठीक ही था एक तरफ़ा था तकरार की वजह ना बना ठीक ही था एक तरफ़ा था असरार की तरह, मैसेज बॉक्स में रहा बेइंतेहा फरहात का सबब रहा जो एक तरफ़ा रहा मजबूर होके वह मिलने आते तो कस्टमरी चेक इन का बोझ पढ़ जाता इत्मीनान है कि वह आज भी गुमान करते है चलो जब तलक हमारी एक ही प्रोफाइल के बारे में पता रहे, ये भी चलता रहे... © नकुल चतुर्वेदी, 8 may, 2022 

مُکَمَّل मुकम्मल

मैं ग़म मे डूबा दिन को रात कर   ना  सका मुझे मेरा प्यार मिल गया , मैं नसीब को बदनाम कर ना सका मैं अकेलापन महसूस कर   ना   सका मुझे मेरा प्यार मिल गया , मैं खुद से बात कर   ना  सका मैं ज़िन्दगी मे मशरूफ था ग़िला कर   ना   सका मुझे मेरा प्यार मिल गया , मैं फरियाद कर   ना   सका मेरा हर पल ज़िया था चकाचैंन्ध कर   ना   सका मुझे मेरा प्यार मिल गया , मैं अंधेरा शामिल कर   ना   सका मेरे भी मंसूबे टूटे आह : का ईन्तेज़ार कर   ना   सका मुझे मेरा प्यार मिल गया , ठोकरों का इस्तिक़बाल कर   ना   सका दिल तो मेरे पास आखिर एक ही था , बार बार दिल देने का वाइदा कर   ना   सका मुझे मेरा प्यार मिल गया , मैं हर मुस्कान पे थोडा और दिल देना बंद कर   ना   सका ©️ नकुल चतुर्वेदी 11-06-2021

अंतर्द्वंद

 हमेशा हमेशा की ओर कभी, कभी हर मोड़ पे वापसी कि सोच लेता हूँ।।  लकीरें खींचता हूँ कभी, कभी मिटा देता हूँ उधेडबुन में डुबा कभी, कभी जद्दोजहद में उलझा हूँ।  उम्मीद के दायरे में रहता हूँ कभी, कभी नसीब से ए'जाज़ कि आस रखता हूँ जीता हूँ आज़ादी में कभी, कभी आज़ाद होते हुए एक क़ैद सी में रहता हूँ।  हमेशा हमेशा की ओर कभी, कभी हर मोड़ पे वापसी कि सोच लेता हूँ।।  सच को जानता हूँ कभी, कभी भुला देता हूँ सच को समझता हूँ कभी, कभी छुपा लेता हूँ।  खुशी की खोज में कभी, कभी खोज में हि खुशी पा लेता हूँ खुद से नाराज़ कभी, कभी सब से नाराज़्गी निभा लेता हूँ।  तूने फ़रामोश सा छोडा था कभी, कभी मैं खुद को मु'आफशुदा सा पाता हूँ तेरी याद मे जीने के सुपुर्द कभी, कभी तेरे ज़िक्र को भी काफी बेअसर सा पाता हूँ।  हमेशा हमेशा की ओर कभी, कभी हर मोड़ पे वापसी कि सोच जाता हूँ।। ©️ Nakul Chaturvedi, 05.06.2021