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AM I DRUNK OR AM I DRUNK…!!

I shout out loud, don’t keep no doubt
I run after a plane, then push the crane

I sing I eat, I love the beat
Do not dance on floor, but on the feet

All I have is friends, all I know is sacrifice

My passion makes my dead car best and music the rest

Every inch of me is glad, I don’t know nobody sad

When I now talk of love, I talk innocence talk purity

I have my own sun, water, food and tree
I still feel like sharing it with everybody

I THINK I HAD MY STINT WITH GOD

Am I Drunk or Am I Drunk

No envy, no first me, and no violent roar
I don’t wanna fist you and I hate you no more

Why the hell I don’t want to dominate
How come am not selfish for my fate

Boss it takes a puke to get rid of some of the best things in the world
I threw out alcohol, human inside me or I just got thrown out of heaven….?

WE GET INEBRIATED WHEN WE ALCOHOL ~ ISE OR WHEN WE NOT…?

How to stabilize could not be my point, when the state of stable is not yet coined.

©Nakul Chaturvedi, 9th August, 2009

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Random Serious

1) कुर्बत में बेवाफ़ाई, फुर्कत में वफ़ा ढ़ूढंता हूं दुनिया मे कैद, खुद से रिहाई ढ़ूढंता हूं ©️ नकुल चतुर्वेदी, जुलाई 29, 2022 2) मुज़्दा की खोज में हूं कई उम्रों से, उब मुकम्मिल ना होने के डर से डर लगना बंद हो गया (- नकुल) ईऋते खत्र है दरिया में फना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना (- ग़ालिब) ©️ नकुल चतुर्वेदी, जुलाई 29, 2022

कुछ और ही

मुझे ज़िन्दगी से कुछ चाहिए था, ज़िन्दगी को मुझसे कुछ और  मैंने ताक पे सब रख हर बार दिल की सुनी, दिल ने हर बार कहा कुछ और बड़ी तेज़ी से मैंने सब्र की हर रात चुनी, सेहेर को बेताबी थी कुछ और मेरे तो अल्फ़ाज़ों तक ने साथ न दिया, कमबख्तों ने माइने बने कुछ और किरदार को अपने ढ़ाला मुत'अद्दिद (several) रंगों में, गदार को ज़िन्दगी से चाहिए था कुछ और सुन सुन के लोगों की मै सुन ना सका, जब तुमने मुझसे कहा कुछ और तुमने क्यों न सुना जो मैं कह न सका, क़ुव्वत-ए-फ़िक्र न गिला तुमसे है कुछ और मोहोब्बत कम कर न सका, ग़ैर-जानिबदार  (impartial) बन ना सका पन्नो पे पन्ने भरता रहा, रम्ज़-ओ-ईमा   (riddle and hint)   तक कर ना सका तू होता तो ज़िन्दगी के माइने होते कुछ और,  हैं अभी भी पर हैं कुछ और तू होता तो ज़िंदगानी होती कुछ और ©️ नकुल चतुर्वेदी, June 18, 2021 

विरह

ल गता है कभी रो-रो के उठ जाता हूँ।  सिरहाने और आँखों को सूखा ही पाता हूँ।  मखौल पे हँसी कम आती है,  नाराज़गी अंदर ही रह जाती है।  रोना भूल गया हूँ शायद,  या रोने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।  रोना आता तो बहुत है,  अपरंपार, हर वक्त, हर बार,  बस सिसक-सिसक के रो नहीं पाता।  अजीब लगता है कितना रोने की इच्छा रखना।  दर्द लेके जो गरीब चले जा रहे हैं,  ज़िंदगी से बिन हथियार, एक अदृश्य लड़ाई लड़े जा रहे हैं।  उनसे पूछो, कभी रो पाए तो दर्द कम होता है।  ये पता है उनको,  लेकिन अपने दर्द से ज़रूरी खुशी है उसकी,  ये लगता है उनको।  हाल जो कोई पूछे तो बढ़िया ही बताता हूँ।  जवाब में लिहाज़ की बात नहीं।  हाल कि मेरे मुझको खुद कोई खबर नहीं।  मेरे हाल की किसी को कोई फिकर नहीं,  पता है, ...... पता है ,  पर इसका मुझको कोई दर्द नहीं।  या ऐसा समझ लो कि किसी भी नए दर्द की अब कोई जगह नहीं।  ऐसा लगता था मुझको, और काश ऐसा ही होता।  ऐसा लगता था मुझको, जब तक तेरी विरह का जो दर्द असीमित-सा था,  ते...