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In D Middle of Nowhere

बड़ी देर से एक शुन्य में हूँ बेनाम
नहीं जानता तू इसका श्रोत है या है परिणाम


अग्नि हूँ अज्ञात या हूँ अगन
मिलूँगा धरती में हो खाक या बनूँगा वन


बन दरिया भी हासिल न हुआ जीवन सफल

सागर ना मिला न बना किसी गाव की नहर

फूल बनके सोचा था महक छोड़ जाता
कुदरत ने गुलशन की जगह वीरान अज़ीज़ जाना


कागज़ बना खौफ्शुदा होकर

आशिक को ना मिलू गुमशुदा बनकर



लफ़्ज़ों की शकल में दर्द छोड़ जाएगा
एक आधे लम्हे में उम्रो का हिसाब छोड़ जाएगा



जो मैं तुझसे प्यार करता हूँ तो क्यूँ कुछ बनू जो हो तुझसे जुदा
दुआ न सही, दवा न सही बेशक तेरे आसुओं की परछाई बनू, चाहे मुझसे खफा हो फिर मेराखुदा !
© Nakul Chaturvedi, 20th June, 2011.

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Random Serious

1) कुर्बत में बेवाफ़ाई, फुर्कत में वफ़ा ढ़ूढंता हूं दुनिया मे कैद, खुद से रिहाई ढ़ूढंता हूं ©️ नकुल चतुर्वेदी, जुलाई 29, 2022 2) मुज़्दा की खोज में हूं कई उम्रों से, उब मुकम्मिल ना होने के डर से डर लगना बंद हो गया (- नकुल) ईऋते खत्र है दरिया में फना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना (- ग़ालिब) ©️ नकुल चतुर्वेदी, जुलाई 29, 2022

कुछ और ही

मुझे ज़िन्दगी से कुछ चाहिए था, ज़िन्दगी को मुझसे कुछ और  मैंने ताक पे सब रख हर बार दिल की सुनी, दिल ने हर बार कहा कुछ और बड़ी तेज़ी से मैंने सब्र की हर रात चुनी, सेहेर को बेताबी थी कुछ और मेरे तो अल्फ़ाज़ों तक ने साथ न दिया, कमबख्तों ने माइने बने कुछ और किरदार को अपने ढ़ाला मुत'अद्दिद (several) रंगों में, गदार को ज़िन्दगी से चाहिए था कुछ और सुन सुन के लोगों की मै सुन ना सका, जब तुमने मुझसे कहा कुछ और तुमने क्यों न सुना जो मैं कह न सका, क़ुव्वत-ए-फ़िक्र न गिला तुमसे है कुछ और मोहोब्बत कम कर न सका, ग़ैर-जानिबदार  (impartial) बन ना सका पन्नो पे पन्ने भरता रहा, रम्ज़-ओ-ईमा   (riddle and hint)   तक कर ना सका तू होता तो ज़िन्दगी के माइने होते कुछ और,  हैं अभी भी पर हैं कुछ और तू होता तो ज़िंदगानी होती कुछ और ©️ नकुल चतुर्वेदी, June 18, 2021 

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